ग़ज़ल -
पहले तो आवाज़ लगानी पड़ती हैं
धीरे धीरे बात बढ़ानी पड़ती हैं
दिल तो हम ले लेते हैं नादानी में
अरसे तक फिर किश्त चुकानी पड़ती है
ये वो शै हैं जो कर सकती हैं पागल
उल्फ़त मेरी जान! छुपानी पड़ती हैं
वस्ल का ये हैं कुछ माहों का है महमाँ
याद तो सारी उम्र निभानी पड़ती हैं
क्या समझे हो ? यूँ हासिल हो जाएगा !
इश्क़ में पूरी जान लगानी पड़ती हैं
मन में रखने से हो जाती हैं हावी
दहशत आख़िरकार जतानी पड़ती हैं
दिन का क्या है कट जाता है मस्ती में
तन्हाई में रात बितानी पड़ती हैं
जब सर के ऊपर हो जाता हैं पानी
तब अपनी औकात दिखानी पड़ती हैं
घर का ज़िम्मा आ जाता हैं काँधों पर
अरमानों को लाग लगानी पड़ती हैं
अपनी पीड़ा लिखना ग़ज़लों में यानी
खुद अपनी ही लाश उठानी पड़ती हैं
सच बोला जाता हैं केवल इक हद तक
उसके बाद तो बात बनानी पड़ती हैं
@ दुर्गेश 💝
____________________________
उल्फ़त - प्यार / मोहब्बत
वस्ल - मिलन की स्थिति
No comments:
Post a Comment