जब सहरा की धूल उड़ाने लगता हूँ
माज़ी की तस्वीर बनाने लगता हूँ
रफ़्ता रफ़्ता दिल रुसवा हो जाता हैं
होले होले हिज्र निभाने लगता हूँ
मेरे तो पाँओं में केवल कांटे हैं
राहों में पर फूल बिछाने लगता हूँ
हाँ वो मेरी ख़ामोशी का हासिल हैं
अक्सर जिस पर शे'र सुनाने लगता हूँ
आँगन में इक बूढ़ी रोती रहती हैं
बच्चों को आवाज लगाने लगता हूँ
सब मेरे बाजू में बैठें सुनते हैं *
जब विरसे के नाम गिनाने लगता हूँ
उर्दू वालो की अलबेली महफ़िल में
मैं हिंदी के गीत सुनाने लगता हूँ
-दुर्गेश
माज़ी - भूतकाल
रफ़्ता रफ़्ता - धीरे धीरे
हिज्र - विरह / जुदाई
विरसा - वसीयत
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