Tuesday, 23 January 2018

जब सहरा की धूल उड़ाने लगाने लगता हूँ

जब  सहरा  की  धूल  उड़ाने लगता हूँ
माज़ी   की   तस्वीर  बनाने  लगता  हूँ

रफ़्ता  रफ़्ता  दिल रुसवा  हो जाता हैं
होले  होले  हिज्र  निभाने   लगता   हूँ

मेरे   तो   पाँओं    में   केवल  कांटे  हैं
राहों  में  पर  फूल  बिछाने  लगता  हूँ

हाँ  वो  मेरी  ख़ामोशी  का  हासिल  हैं
अक्सर जिस पर शे'र सुनाने लगता हूँ

आँगन  में  इक  बूढ़ी  रोती  रहती  हैं
बच्चों  को  आवाज  लगाने लगता हूँ

सब   मेरे    बाजू   में    बैठें   सुनते  हैं *
जब  विरसे  के नाम  गिनाने लगता हूँ

उर्दू  वालो  की  अलबेली महफ़िल में
मैं  हिंदी  के   गीत  सुनाने  लगता  हूँ

-दुर्गेश

माज़ी - भूतकाल
रफ़्ता रफ़्ता - धीरे धीरे
हिज्र - विरह / जुदाई
विरसा - वसीयत

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