Tuesday, 21 February 2017

ग़ज़ल

दावा    ये  हैं  की  शातिर हैं हम
सच तो ये  हैं  की  शाइर  हैं हम

चारागर  से   दुरुस्त   ना  होगा
मसला ये हैं की काफिर  हैं हम

खुद पे खुलते ही तो नइ हम पर
पूरे  जग  पे  तो  जाहिर  हैं हम

यूँ  तो  मौजुद  हूँ  हर  ज़ेहन में
लेकिन खुद से तो बाहिर हैं हम

                  @ दुर्गेश लौहार

गाँव

गांवा वाळी  हगळी  बातां  जिंदाबाद
हंसे  रुकड़ा आतां  जातां   जिंदाबाद

काळो  पीळो धूळो  रातों  काशाखान
खेतां  का  सब  ढेपा  भाटां जिंदाबाद

हूक्की हूक्की फाइव स्टारा की लागेन
घर  को छूल्लो औरी रोट्या जिंदाबाद

न्यारा  न्यारा  मनक न ये हैं भेळाभेळ
मनका  करता ढांडा चोपा  जिंदाबाद

कीको  कीमू  केणो कइ  यो देवे ज्ञान
घर  का  हारा  भूड्डा  ठाडा  जिंदाबाद

                            @ दुर्गेश लौहार